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Friday, February 10, 2017

मोहिनी सी सूरत

एक प्यास थी मन में...
एक प्यारी सी उमंग थी...
कल्पना के फूलों पर...
एक मोहिनी सी सूरत थी...
देकर तुझे खुदा नें ...
सपनों को सच किया है...
उस

मोहिनी सी सूरत को...
तेरा हीं रूप दिया है...
फूलों में जैसे खुशबू...

दिखने से नहीं दिखती है...
ऐसा हीं प्यार मेरा ...

शब्दों में न ढला है....
बस ममता के एहसास से...
तन-मन मेरा खिला है...
जीवन में रंग ऐसा...

सिर्फ तू ने मुझे दिया है...
चाहत यही है मेरी...

दुनियाँ से जब जाऊँ मैं...
यह अनमोल साथ तेरा...

मरने तक पाऊँ मैं...!!!
I PROMISE 💝

Sunday, February 5, 2017

करवा चौथ

कल फिर
करवा चौथ है...
पिछले साल का ज़ख्म,
अभी भरा नहीं,रिस रहा है धीरे धीरे,
कैसे चल दिये थे तुम,मुझे छोड़ कर...
मेहँदी लगे हाथों से मैं तुम्हें,रोकती रह गई,
किस निष्ठुरता से झटक दिया था तुमने मेरे हाथों को,
पल भर में सबकुछ बिखर गया था...
सारे रिश्ते...और टूट गया था बहुत कुछ,
मन के अंदर बिना किसी आवाज़ के...
भींगी पलकों से एकटक देखती रही मैं,
उस चाँद को,ढूंढती रही तुम्हें उसके अक्स में...
मगर तुम कहीं नज़र नहीं आए,
टूटे तारों को जोड़ने की कशमोकश में...
जब भी एक सिरा पकड़ा..दूसरा हाथ से फिसल गया,
सच तो ये है कि जोड़ना तो मैंने चाहा था...
तुम्हारी तरफ से कभी कोई सिरा जुड़ा हीं नहीं,
आज फिर तुम्हारे आने का संदेशा आया है...
कितनी खुश हूँ मैं ये सोचे बगैर कि,
पूरे साल तुम कहाँ रहे...
मैंने हाथों में फिर तेरी याद कि मेहँदी लगा रखी है,
जबकि मालूम है मुझे भी हक़ीक़तें तुम्हारी...
क्या सचमुच इतना बड़ा दिल है,
जो भी हो फर्क तो है तुम्हारे मेरे प्यार में...
तुमने कभी जोड़ना नहीं सीखा...
और मैंने कभी तोड़ना नहीं जाना।।

अक्स

जब भी
देखती हूँ मैं
आईना
मेरे बदले
तू नज़र
आता है
मोहब्बत
करने वालों के
शीशे में
क्या अक्स भी
बदल जाता है??

रिश्ते की परिभाषा...

देखो ना
वक़्त ने बदल दी है
तेरे मेरे रिश्ते की
परिभाषा...
पहले दोस्ती
फिर प्यार
और अब
अजनबी सा एहसास।

रहगुज़र

मुझमें ना ढूंढना मुझको,
मैं खुद में होकर भी नही हूँ।
बहुत दूर तक चली है
ये रहगुज़र मेरे साथ साथ
मगर जहाँ से मैं चली थी
आज भी वहीँ हूँ...
कहते हैं अजीज मेरे
बदल गई हूँ मैं अब
जाकर उन्हें कहे कौन
मैं कशमोकश में पड़ी हूँ
आजमाइशें बहुत हैं
और हौसले टूटते हैं
आसमाँ को छूना है
और मैं जमीं पर खड़ी हूँ।

इंतहाँ

बुझ के सुलगता रहा फिर
जल के भड़कता रहा...
कहीं भीतर हीं भीतर
कोई कोना....
रातों दिन दहकता रहा
बात जब भी आई
चाहत के इंतहाँ की
टीस बन कर मेरे दिल में
हर घडी धड़कता रहा.... !!

Tuesday, January 31, 2017

शिकस्त

तमाम उम्र ज़िंदगी मुझे तलाशती रही
और मैं ज़िंदगी से दूर दूर भागती रही।
कुछ इस कदर छला था हवाओं नें मुझे,
मैं आंधियों में भी एक दिया जलाती रही।
ना डर तूफान का, कुछ ऐसा जुनून था,
मैं कश्तीयों को समंदर में उतारती रही।
मरेगा क्या अब ये जालिम ज़माना मुझे,
'रश्मि' जान को हथेलियों पर सजाती रही।
था शौक कि दे वो, शिकस्त हर मोड़ पर।
और मैं अपनी जीत का पताका फहराती रही।