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Friday, July 19, 2013

````मैं कहाँ हूँ````

तुम्हीं बताओ
तुम्हारी ज़िंदगी में
मैं कहाँ हूँ...
सुबह की ताजगी में
या ढलती शाम में
बारिश की पहली फुहार में
या चाँद की चाँदनी में
या कि फिर तपती धूप में
या रात के गहन अँधेरों में
तुम्हारी गहरी चिंतन में
या सरसराती सोच में

तुम्हीं बताओ
तुम्हारी ज़िंदगी में
मैं कहाँ हूँ

ज़िंदगी के हुजूम से घबड़ा कर
साहिल के किसी किनारे पर
तुम्हारी उँगलियों में दबी
सिगरेट के धुएँ के छल्लों में
या बेइरादा उभर आई किसी सोच में
इक दर्द मोहब्बत टूटने का
या दूसरा आगाज होने का
किसी खुश आदाब लम्हों में

तुम्हीं बताओ
तुम्हारी ज़िंदगी में
मैं कहाँ हूँ....

-----रेनकोट-----

तुम्हें याद है....
अक्सर बारिश के दिनों में
तुम अपना रेनकोट नहीं लाते थे
साझा बारिशों का वादा जो था...
तुम्हें सर्दी जल्दी लगती है
इसलिए मैं तुम्हें
अपना रेनकोट दे देती
और खुद भींगे दुपट्टे में
अपने आप को लपेटे घर आती
बालों से टप टप गिरती पानी की बूंदे
ज़मीं पर नहीं,मेरे दिल पर गिरती
बहुत दिनों बाद इस बार
हमदोनों बारिश में साझा भींगे
बिना रेनकोट के....
तन के साथ मन भी
कहीं भींग रहा था
मैं तो घर आ गई मगर मन....???
मन वही कहीं...
तुमसे लिपट कर रह गया
आज भी जब बारिश होती है
मैं बालकनी में खड़ी हो
अपनी अंजुरियों में पानी भर
उछाल देती है...यूँ जैसे मैंने तुम्हें
भींगों दिया हो...और मेरा अन्तर्मन
उन लम्हों को याद कर भींग जाता है...
क्या तुम्हें भी वो पल याद हैं...
क्या अब भी तुम
बिना रेनकोट के निकलते हो....

~~~खुदगर्ज़~~~

एक तो दुनियाँ के
रश्म-ओ-रिवाज़
उस पर तुम्हारी बेरुखी
चलो जुदा हो हीं जाते हैं
समाज को दिखने के लिए
कब तक साथ चलेंगे हम
मुझे तुमसे कोई
शिकायत नहीं
हाँ खुद से हीं
नाराजगी है
जो कदम आज उठाया
उसका निर्णय पहले हीं
क्यू नहीं ले लिया था
तुम मेरे दामन की
सारी खुशियाँ ले लो
मैं अपने गम ले जाती हूँ
फिर कभी तुम ये ना कहना
'रश्मि' तो खुदगर्ज़ निकली...!!!

Friday, June 21, 2013

----चाहे जिस रंग में रंग दो----


'तुम' मुझे 'पागल' कहते हो
ठीक हीं कहते हो....

जो मुझे समझ ना पाये
उनको मैं पागल हीं लगूँगी
चाहे जिस रंग में रंग दो मुझे
मेरा अपना कोई रंग नहीं
जब चाहो मँझधार में छोड़ दो
मुझे तुमसे कोई जंग नहीं
नींद को तरसी आँखें मेरी
जब जो चाहे ख्वाब तुम ले लो
चाभी भरो जी भर खेल के लो
फिर एक रैपर में पैक कर के रख दो
रूप सजाओ,शृंगार करो
प्यार करो आँखों में बसाओ
और जब दिल भर जाए
दिल से उठा कर ताक पर रख दो




'तुम' मुझे 'पागल' कहते हो
ठीक हीं कहते हो....

-----मेरे रगों में-----


गुजरे हुए मौसम की खोई हुई ख़ुशबू
यूँ मेरे रगों में उतर आई...
कि जैसे कोई भूला हुआ रूपहला ख्वाब
एक हकीकत बनकर सामने आ जाए
जैसे सहरा की जमीं पर पहली बारिश...


जैसे कोई बिछड़ा हुआ शख्स
इबादत बन कर जहां पर छा जाये
जैसे किसी ने बहुत हल्के से
दिल के दरवाज़े पर दस्तक दी हो
और बड़ी नरमी के साथ....
यादों के बंद दरीचों को खोला हो
कुछ इस तरह कि हर दरीचे की
अलग-अलग ख़ुशबू से मेरे घर का आँगन
रंग-दर-रंग छलक जाए....!!!!

हम तुम्हारे मुंतज़िर हैं.....



उफ़्फ़ क्या मौसम है
बारिश की बूंदे
पेड़ो की हरी शाख पर 
जब छन छन गिरती है
तो यूँ लगता है कि
तुम्हारी हंसी
मेरे कानों में गूंज रही हो
अपनी भिंगी लटों को
झटकते हुए
मैं एक बार फिर
तुम्हारे तसव्वुर में
हौले से मुसकुराती हूँ....
हवा जब मेरी ओढनी से
अठखेलियाँ करता है
तो ओढनी का हल्का
गुलाबी रंग मेरे चेहरे पर
बिखर जाता है...
मेरे दर से तुम्हारे दरवाजे तक
जो एक रास्ता जाता है
वो खुशबू से भर जाता है...
जैसे मेरी राह ताक रहा हो
रश्मि अब आ भी जाओ
हम तुम्हारे मुंतज़िर हैं.....!!!!

रश्मि अभय (१९/६/२०१३,८:१५ पी एम)